
देव प्रभाकर तोमर: चंबल के डकैत के पोते ने UPSC में लिखी सफलता की नई इबारत
हर साल UPSC परीक्षा में हजारों युवा अपनी किस्मत आजमाते हैं, लेकिन कुछ ही ऐसे होते हैं जिनकी कहानी पूरे देश को प्रेरित कर जाती है। ग्वालियर, मध्य प्रदेश के रहने वाले देव प्रभाकर तोमर ऐसी ही एक प्रेरणादायक कहानी के नायक हैं, जिन्होंने अपने परिवार की पुरानी छवि को पीछे छोड़कर सफलता की एक नई इबारत लिखी है। उनकी यह यात्रा इस सोच को भी चुनौती देती है कि किसी का पिछला इतिहास उसके भविष्य को तय कर सकता है।
पारिवारिक पृष्ठभूमि और शिक्षा
देव प्रभाकर तोमर का पारिवारिक इतिहास बेहद दिलचस्प और चुनौतीपूर्ण रहा है। उनके दादा रामगोविंद सिंह तोमर कभी चंबल के कुख्यात डकैत थे, जिनका नाम सुनकर पूरा इलाका कांप उठता था। इस विरासत के कारण उनके परिवार को अक्सर समाज में "तेरे दादा डकैत थे, तुम कुछ नहीं कर पाओगे" जैसे ताने सुनने पड़ते थे।
हालांकि, देव के पिता बलवीर सिंह तोमर ने इस पारंपरिक छवि से अलग राह चुनी। उन्होंने पढ़ाई को अपना हथियार बनाया, संस्कृत में पीएचडी की और एक शिक्षक के रूप में समाज को दिशा दी। यही संस्कार उन्होंने अपने बेटे देव को भी दिए। देव ने अपनी शिक्षा में उत्कृष्टता हासिल की और भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (IIT) से इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी की।
शानदार करियर से यूपीएससी की ओर
अपनी इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी करने के बाद, देव को नीदरलैंड की प्रतिष्ठित फिलिप्स कंपनी में एक साइंटिस्ट के रूप में नौकरी मिली, जहाँ उनका वार्षिक पैकेज 88 लाख रुपये था। यह किसी भी युवा के लिए एक सपनों की नौकरी मानी जाती है, लेकिन देव ने अपने परिवार और समाज के लिए कुछ बड़ा करने का सपना देखा। इस सपने को पूरा करने के लिए उन्होंने अपनी लाखों की यह नौकरी छोड़ दी और UPSC सिविल सेवा परीक्षा की तैयारी में जुट गए। यह फैसला आसान नहीं था क्योंकि परिवार पर आर्थिक दबाव था, सामाजिक ताने जारी थे और अपनी व्यक्तिगत जिम्मेदारियाँ भी थीं।
संघर्ष, असफलताएँ और अटूट विश्वास
UPSC की तैयारी के दौरान देव को कई बार असफलता का सामना करना पड़ा। उन्होंने तीन बार मेंस परीक्षा उत्तीर्ण की, लेकिन हर बार अंतिम चरण, यानी इंटरव्यू में चयन से चूक गए। बार-बार आखिरी बाधा पर आकर रुक जाना किसी के भी आत्मविश्वास को तोड़ सकता है, लेकिन देव ने खुद को संभाला और लगातार मेहनत जारी रखी। यह उनका छठा और अंतिम प्रयास था। इस बार उनके पास कोई 'प्लान बी' नहीं था – बस एक ही सपना था, UPSC को क्लियर करना।
परिवार का सहयोग और प्रेरणा
देव की सफलता में उनके परिवार का सबसे बड़ा योगदान रहा। उनकी पत्नी ने दो साल तक नौकरी कर परिवार की आर्थिक मदद की, ताकि देव बिना किसी चिंता के अपनी पढ़ाई पर ध्यान केंद्रित कर सकें। उनकी माँ हमेशा उन्हें "मेरा बेटा कलेक्टर बनेगा" कहकर प्रेरित करती थीं और पिता ने भी हमेशा पढ़ाई के लिए प्रोत्साहित किया। देव ने खुद कहा है, "मेरी सफलता में मेरे माता-पिता और पत्नी का सबसे बड़ा योगदान है।" उन्होंने सामाजिक तानों को अपनी कमजोरी नहीं, बल्कि अपनी ताकत बनाया।
UPSC में ऐतिहासिक सफलता और उसका संदेश
अपने दृढ़ संकल्प, अथक मेहनत और परिवार के अटूट समर्थन के दम पर, देव प्रभाकर तोमर ने UPSC सिविल सेवा परीक्षा 2024 में 629वीं रैंक हासिल कर एक नई मिसाल कायम की।
उनकी यह कहानी सिर्फ एक व्यक्ति की व्यक्तिगत सफलता नहीं है, बल्कि पूरे समाज के लिए एक गहरा और सशक्त संदेश है:
- अतीत चाहे जैसा भी हो, भविष्य को मेहनत और लगन से बदला जा सकता है।
- किसी की पहचान उसके पूर्वजों के कर्मों या सामाजिक पृष्ठभूमि से नहीं, बल्कि उसकी अपनी शिक्षा और प्रयासों से तय होती है।
- शिक्षा और कड़ी मेहनत सबसे बड़ा हथियार हैं, जो किसी भी परिस्थिति को बदलने की शक्ति रखते हैं।
- बार-बार की असफलताएँ अंततः सफलता की सीढ़ियाँ बन सकती हैं, बशर्ते आत्मविश्वास न खोया जाए।
- सही दिशा में किया गया प्रयास और परिवार का भावनात्मक व आर्थिक सहयोग किसी भी मुश्किल लक्ष्य को प्राप्त करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
निष्कर्ष
देव प्रभाकर तोमर का जीवन सफर दृढ़ संकल्प, अनवरत मेहनत और अटूट पारिवारिक समर्थन का एक उत्कृष्ट उदाहरण है। उनकी कहानी उन सभी युवाओं के लिए एक प्रेरणा है, जो अपनी सामाजिक या पारिवारिक पृष्ठभूमि के कारण खुद को कमजोर समझते हैं। देव ने साबित कर दिया कि सकारात्मक सोच और अटूट विश्वास के साथ कोई भी बाधा पार की जा सकती है, और अतीत की परछाई से निकलकर एक उज्ज्वल भविष्य बनाया जा सकता है। वह आज अपने परिवार के लिए ही नहीं, बल्कि पूरे समाज के लिए एक प्रेरणा स्रोत बन चुके हैं।